- जगदीश पंकज
- कविता / ग़ज़ल
चीखता तब तिलमिलाकर दिन
फेंकता उद्दंड श्रद्धा को
सटी आँगन से रसोई में
द्वार की साँकल बजाकर दिन
फेंकता उद्दंड श्रद्धा को
सटी आँगन से रसोई में
द्वार की साँकल बजाकर दिन
नए मकान के सामने पक्की चहारदीवारी खड़ी करके जो आहाता बनाया गया है, उसमें दोनो ओर पलाश के पेड़ों पर लाला लाल फूल छा गए थे।
रेखाएं तो बहुत हैं। इन्हीं रेखाओं के जाल के जंजाल में मनुष्य फंसा पड़ा है। एक देश से दूसरे देश तक। एक-एक इंच जमीन पर भी रेखाएं खिंची पड़ी हैं।
चिलचिलाती तेज धूप मैं गर्म हवाएं चल रही थी ऐसे खतरनाक मौसम में अर्धनग्न अपने डागले के नीचे बैठा कालूबा बीड़ी पी रहा था सिर के आधे बाल सफेद, शेष सिर सपाट था। आंखें धसी धसी और हाथ पैर किसी लकड़ी की तरह सूखे पतले से।
हेस्टिंग्स आए हुए मुझे बहुत वर्ष होने को है। यह लंदन से थोड़ा दूर एक बेहद साफ सुथरा गाँव है। मेरा यहाँ आना कैसे हुआ, मुझे भारत क्यों छोड़ना पड़ा, एक मार्मिक घटना है।
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