- विजया गुप्ता
- कविता / ग़ज़ल
इनको ज़रा उकेरूं तो गीत लिखूं
कुछ अधूरा सृजन ,बिखरे सपने
कुछ धुंधली यादेँ, बिछड़े अपने
कुछ अश्रु बूंद ठहरी पलकों पर
मन में उभरते कुछ चित्र अधबने
इनको ज़रा उकेरूं तो गीत लिखूं।
कुछ अधूरा सृजन ,बिखरे सपने
कुछ धुंधली यादेँ, बिछड़े अपने
कुछ अश्रु बूंद ठहरी पलकों पर
मन में उभरते कुछ चित्र अधबने
इनको ज़रा उकेरूं तो गीत लिखूं।
चालीसवें बसंत पर हूँ
कल रात की ढ़लान के बाद
अभी भी मैं शायद खिला हूँ...
पर जर्जरता क्षीणता तो नियति है।
तुम माँ हो, दुहिता हो,भगिनी, मित्र तुम्हीं ,
जीवन को जीवन दे मात्र चरित्र तुम्हीं ।
तुम सागर हो प्यार -प्रीति का ममता का,
सहिष्णुता सद्भाव ,सौम्यता ,समता का ।
आये फिर लहरों में तिरने के दिन
घोल रही मधुगन्धा मदमाते घोल
इच्छाएँ घूम रहीं बाँध-बाँध टोल
पल्लव से अंतर के चिरने के दिन
जिस रोज तुम्हारी गागर से सतरंगी रंग छलक जाए .
उस रोज समझना धरती पर फिर फागुन आने वाला है
अनसुनी सी रही रात की रागिनी
अनमने से सपन कसमसाते रहे।
हम सजाते रहे छांव के गुलमोहर
वो खड़े धूप में तन जलाते रहे।
आमों पर खूब बौर आए
भँवरों की टोली मँडराए
बगिया की अमराई में फिर
कोकिल पंचम स्वर में गाए
हर क़दम पर हैं इम्तिहान कई।
है अकेला दिया, तूफ़ान कई।
एक साये को तरसते हैं हम,
यूँ तो सर पर हैं आसमान कई।
महफ़िल पै थी निगाह यही सोचते रहे,
आई किधर से वाह यही सोचते रहे।
उम्मीद कम थी फिर भी भरोसा ज़रूर था,
कोई तो दे पनाह यही सोचते रहे।
प्रहर-दिवस, मास-वर्ष बीते
जीवन का कालकूट पीते.
पूँछें उपलब्धियाँ हुईं
खेलते हुए साँप-सीढ़ी
मंत्रित-निस्तब्ध सो गयी
आग पर पानी
डालकर
राख सुलगाते हैं
कितने कमजोर
हैं, हम जो नाहक
डरकर भाग जाते हैं।
स्मृतियों के वातायन से,
झाँक- झाँक कर मुझे रिझाते।
भावों के झरने नि:सृत हो,
तृषित अधर की प्यास बुझाते।।
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