पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की जन्म-शताब्दी उनके राजनीतिक जीवन के साथ-साथ उनके विचारों को समझने का अवसर देती है। उनकी नज़र में विकास का अर्थ मनुष्य की गरिमा, श्रम और सामाजिक न्याय से तय होता था।
उनके चिंतन में किसान, खेतिहर मजदूर, श्रमिक, बुनकर और कारीगर भारत की अर्थव्यवस्था के आधार थे। इसलिए उनका मज़दूर विमर्श केवल मजदूरी तक सीमित नहीं था, बल्कि रोजगार, सम्मान, सुरक्षा और आर्थिक भागीदारी के प्रश्नों से जुड़ा था।
चंद्रशेखर श्रम को केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की शक्ति मानते थे। उनके लिए विकास का मूल्यांकन केवल उत्पादन और आर्थिक वृद्धि के आँकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि खेत, कारखाने, हथकरघे और निर्माण-स्थलों पर काम करने वाले लोगों के जीवन में कितना बदलाव आया। यही सोच उनके विकेंद्रीकरण, छोटे उद्योगों और स्थानीय साधनों को बढ़ावा में दिखाई देता है।
1983 की भारत यात्रा उनके राजनीतिक जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक थी। कन्याकुमारी से राजघाट तक की लगभग 4,500 किलोमीटर से अधिक लंबी पदयात्रा का उद्देश्य जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझना था। इस यात्रा ने उनके राजनीतिक चिंतन को ग्रामीण भारत की वास्तविकताओं से और गहराई से जोड़ा।इस यात्रा के दौरान जल-संकट, सिंचाई और कृषि की समस्याओं को करीब से देखते हुए उन्होंने गंगा और कावेरी जैसी नदियों को जोड़ने की महत्वाकांक्षी परिकल्पना पर विचार किया। इसके पीछे केवल जल-प्रबंधन की सोच नहीं थी, बल्कि कृषि उत्पादन, सिंचाई और ग्रामीण रोजगार को मजबूत करने की व्यापक चिंता थी। उनके लिए किसान और खेतिहर मजदूर की समस्या को सिंचाई, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से अलग करके नहीं देखा जा सकता था।
चंद्रशेखर के चिंतन में ‘काम का अधिकार’ लोकतांत्रिक राज्य की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी से जुड़ा था। वे रोजगार को केवल बाजार की मांग पर छोड़ने के पक्ष में नहीं थे। भारत जैसे श्रम-बहुल देश में उनका जोर श्रम-प्रधान उद्योगों, छोटे उत्पादन और स्थानीय संसाधनों पर आधारित विकास पर था।
उनके प्रधानमंत्रित्व काल में ‘रचना वाहिनी’ का विचार इसी सोच का व्यावहारिक उदाहरण था। इसके माध्यम से बड़ी श्रम-शक्ति को संगठित कर चंबल के बीहड़ों और ऊबड़-खाबड़ भूमि को समतल करके कृषि योग्य बनाने की परिकल्पना की गई थी। इसमें रोजगार और राष्ट्र-निर्माण को एक-दूसरे से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। भूमिहीन और बेरोजगार श्रमिक को केवल राहत देने के बजाय उसके श्रम को ऐसी उत्पादक गतिविधि से जोड़ना, जिससे भूमि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की उत्पादकता बढ़े, इस विचार की विशेषता थी।
चंद्रशेखर की चिंता पारंपरिक कारीगरों और हथकरघा बुनकरों की आजीविका को लेकर भी थी। बुनकरों का संकट केवल बाजार का संकट नहीं है। कच्चे माल की बढ़ती कीमत, उत्पादन की लागत, बिक्री की अनिश्चितता और सामाजिक सुरक्षा का अभाव उसके पूरे परिवार और पारंपरिक कौशल को प्रभावित करता है। इसलिए छोटे उत्पादकों और कारीगरों की समस्या को केवल ‘लघु उद्योग’ की समस्या मानना पर्याप्त नहीं है इसमें आजीविका, परम्परागत कार्यविधि और आत्मसम्मान भी शामिल हैं।
बाल श्रम के प्रश्न को भी इसी सामाजिक यथार्थ के संदर्भ में देखा जा सकता है। गरीब परिवारों में बच्चे की आय कई बार मजबूरी बन जाती है। इसलिए केवल कानून बनाकर बाल श्रम समाप्त करना पर्याप्त नहीं; गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा की समस्याओं का समाधान भी आवश्यक है। चंद्रशेखर की यह दृष्टि सामाजिक समस्याओं को उनकी जड़ों से देखने की आवश्यकता पर बल देती है।
इसी प्रकार खेतिहर मजदूरों के संदर्भ में न्यूनतम मजदूरी का प्रश्न कृषि की उत्पादकता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। यदि कृषि अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी, तो मजदूरी और रोजगार की स्थिरता भी कठिन होगी। इसलिए चंद्रशेखर की दृष्टि में कृषि, सिंचाई, ग्रामीण रोजगार और मजदूरी एक-दूसरे से जुड़े हुए प्रश्न थे।
चंद्रशेखर आर्थिक वृद्धि को केवल आँकड़ों में देखने के पक्ष में नहीं थे। उनके लिए मूल प्रश्न था विकास किसके लिए है? यदि उत्पादन बढ़े, लेकिन उसका लाभ समाज के सीमित वर्ग तक सिमट जाए और मेहनतकश लोगों के जीवन में सुधार न आए, तो विकास की सामाजिक उपयोगिता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
पूंजी के केंद्रीकरण और छोटे उत्पादकों पर बढ़ते दबाव को लेकर उनकी चिंता इसी संदर्भ में समझी जा सकती है।उनकी स्वदेशी और विकेंद्रीकृत सोच बंद अर्थव्यवस्था का समर्थन करने वाली नहीं थी, बल्कि ऐसी आर्थिक व्यवस्था की खोज थी जिसमें देश अपनी श्रम-शक्ति, स्थानीय उत्पादन और सामाजिक संसाधनों को मजबूत करके बाहरी आर्थिक दबावों का सामना कर सके।
आज रोजगार, असंगठित श्रम, ग्रामीण संकट, कारीगरों की आजीविका और आर्थिक असमानता के प्रश्न फिर सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में हैं। ऐसे समय में चंद्रशेखर के विचार प्रासंगिक हो जाते हैं। आज की आर्थिक परिस्थितियाँ उनके समय से अलग हैं, लेकिन श्रम और विकास को मनुष्य की गरिमा से जोड़ने की उनकी दृष्टि अब भी महत्वपूर्ण है।
चंद्रशेखर की जन्म-शताब्दी का सबसे सार्थक अर्थ उन्हें केवल स्मरण करना नहीं, बल्कि उनके विचारों को आज के श्रमिक, किसान, बुनकर, कारीगर और असंगठित मजदूर की वास्तविकताओं से जोड़कर देखना है।
उनकी सबसे महत्वपूर्ण सीख यही है कि विकास का केंद्र बाजार नहीं, मनुष्य होना चाहिए। श्रम केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि गरिमा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक न्याय का आधार है। किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके सरकारी खजाने या आर्थिक आँकड़ों में नहीं, बल्कि उन लोगों के श्रम में होती है जो उसके समाज और अर्थव्यवस्था का निर्माण करते हैं।

लेखक: मोहम्मद इरफान ऊर्फी
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी के वैचारिक विषयों के शोधार्थी एवं पेशे से फार्मास्यूटिकल मैन्युफैक्चरिंग में क्वालिटी कंट्रोल मैनेजर।
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