- डॉ राजेन्द्र गौतम
उम्र वन में सांझ-सी ढलती
व्यर्थ हम जिनके लिए भटके, सिसकतीं वे--
नागपाशों में पड़ी मलयज हवाएं हैं ।
व्यर्थ हम जिनके लिए भटके, सिसकतीं वे--
नागपाशों में पड़ी मलयज हवाएं हैं ।
क्या जानूं क्यूं उमड़ा होगा
पहली - पहली बार समंदर ,
बूंद बराबर रह जाता हूं
देख तेरा विस्तार समंदर !
आज, 15 अप्रैल है। ...2021 की 15 अप्रैल
आज तुम्हें गए हुए 6 साल हो रहे हैं
बावजूद इसके,
पीड़ा व्यापित है दिग-दिगन्त, सुख थोड़ा है पर दुख अनन्त ;
पतझड़ बगिया में डोल रहा, कैसा वसन्त ? किसका वसन्त ??
आशाओं के बादल सिरजे
नभ के आँगन में
उम्मीदों की पड़ीं फुहारें
पतझड़ जीवन में।
हक़ीक़त हो गयी उसको पता तो,
हुआ वो बेसबब हमसे ख़फ़ा तो।
अँधेरे में कोई ग़फ़लत न करना,
वहाँ भी देखता होगा ख़ुदा तो।
पृथ्वी अरबों साल से घूमते घूमते भी
कभी नहीं निकली हेबिटेबल जोन से बाहर,
सूर्य ने आज तक नही छोड़ी अपनी जगह
चंद्रमा आज भी काट रहा पृथ्वी के चक्कर
उसके अगाध प्रेम में।
हर महफ़िल में, हर मौक़े पर थी दुश्वारी, क्या करते,
भक्तजनों के बीच में रहकर रायशुमारी क्या करते !
संत खड़े जयकार कर रहे, ज्वाला देवी भड़क रहीं,
ऐसे में हम ध्वजा-नारियल-पान-सुपारी क्या करते !
अभी- अभी रात ने
अपनी काली जुल्फों को समेटा है
अभी- अभी रात ने
अपनी बांहों के बंधन ढीले किए हैं
अतीत के दंश
वृक्ष बन खड़े हैं ।
शाखाओं की ,
विशालकायता
यमदूत सी लगती है ।।
स्वयं को
खोजने निकला है
फिर से बावरा ये मन
हमें मालूम है इस राह में हैं सैकड़ों अड़चन
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