हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक याचिका में ‘पसमांदा’ मुसलमानों के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के भीतर 10 प्रतिशत अलग उप-कोटा निर्धारित करने की मांग की गई है।
प्रथम दृष्टया यह मांग सामाजिक न्याय की दिशा में एक प्रयास प्रतीत होती है, क्योंकि इसका घोषित उद्देश्य मुस्लिम समाज के भीतर ऐतिहासिक रूप से वंचित जातियों को समुचित प्रतिनिधित्व दिलाना है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या धार्मिक पहचान के आधार पर उप-कोटा बनाना दीर्घकालिक और संवैधानिक समाधान है, या फिर यह सामाजिक न्याय की बहस को एक नए सांप्रदायिक खांचे में सीमित कर देगा?
इस प्रश्न का उत्तर भावनात्मक आग्रह से नहीं, बल्कि संवैधानिक सिद्धांतों, समाजशास्त्रीय यथार्थ और नीतिगत व्यावहारिकता के आधार पर खोजा जाना चाहिए।
देशज 'पसमांदा’ शब्द मुस्लिम समाज के भीतर विद्यमान जातिगत वंचना का सामाजिक-राजनीतिक नाम है। मंडल आयोग (1980) ने अनेक देशज पस्मान्दा जातियों को उनके सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर ओबीसी सूची में शामिल किया था। आज भी बड़ी संख्या में मुस्लिम पिछड़े जैसे धुनकर, बुनकर, दर्जी, कसाई, तेली, नाई, गद्दी, मनिहार तथा मुस्लिम दलित जैसे हालालखोर, धोबी, नट आदि जातियाँ ओबीसी श्रेणी में आती हैं। कुछ अत्यंत वंचित जातियाँ जैसे बन गुजर, बकरवाल आदि अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी में भी सम्मिलित हैं तथा आरक्षण का लाभ ले रही हैं। अतः मूल प्रश्न आरक्षण की उपलब्धता का नहीं, बल्कि उसके न्यायपूर्ण वितरण का है। क्या आरक्षण का लाभ वास्तविक रूप से सबसे वंचित समूहों तक पहुँच रहा है? या वह कुछ अपेक्षाकृत संगठित और प्रभावशाली जातियों तक सीमित हो गया है?
आरक्षण की संवैधानिक अवधारणा धर्म-आधारित नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन पर आधारित है। इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) के ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धर्म स्वयं में आरक्षण का आधार नहीं हो सकता। विदित हैं कि कोई भी धर्म “पिछड़ा” या “दलित” नहीं होता; पिछड़ापन सामाजिक संरचनाओं में निहित होता है।
इसलिए यदि ओबीसी के भीतर उप-वर्गीकरण की आवश्यकता है, तो उसका आधार धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि ठोस और प्रमाणित सामाजिक-आर्थिक मानक होने चाहिए जैसे शिक्षा का स्तर, सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व, भूमि स्वामित्व, आय, तथा ऐतिहासिक पेशागत वंचना।
पसमांदा आंदोलन की मूल चेतना भी यही रही है कि मुस्लिम समाज के भीतर की जातिगत असमानताओं को स्वीकार किया जाए, पर समाधान को सांप्रदायिक द्वंद्व में न बदला जाए।
भारतीय समाज में अनेक जातियाँ ऐसी हैं जिनका ऐतिहासिक पेशा और सामाजिक स्तर धर्म से परे समान रहा है जैसे हिंदू यादव और मुस्लिम गद्दी, हिंदू तेली और मुस्लिम तेली, हिंदू बुनकर और मोमिन अंसार, हिंदू धोबी और मुस्लिम धोबी। इन समुदायों की सामाजिक स्थिति का निर्धारण उनके धार्मिक नाम से अधिक उनके पेशागत और जातिगत इतिहास से हुआ है।
सच्चर समिति (2006) ने भी संकेत दिया था कि कई संदर्भों में मुस्लिम ओबीसी की स्थिति हिंदू ओबीसी से तथा मुस्लिम दलितों की स्थिति हिंदू दलितों से भी अधिक चुनौतीपूर्ण पाई गई। यह तथ्य इस ओर संकेत करता है कि समस्या वास्तविक है और गंभीर भी। किंतु इसका समाधान धार्मिक उप-कोटा नहीं, बल्कि तुलनात्मक वंचना के वैज्ञानिक विश्लेषण में निहित है। यदि किसी विशेष जाति या समूह का प्रतिनिधित्व अत्यंत कम है, तो उसे “अति-पिछड़ा” उप-वर्ग में रखा जा सकता है परंतु यह वर्गीकरण वस्तुनिष्ठ मानकों पर आधारित होना चाहिए।
ओबीसी आरक्षण व्यवस्था की एक बड़ी व्यावहारिक समस्या राज्य और केंद्र की सूचियों के बीच विद्यमान असंगतियाँ है। अनेक जातियाँ राज्य सूची में शामिल हैं, किंतु केंद्रीय सूची में नहीं। उदाहरण के लिए बिहार में सूचियों के नवीनीकरण के बाद 17 ओबीसी समूह ऐसे हैं, जिन्हें केंद्रीय सूची में स्थान नहीं मिला। उत्तर प्रदेश के दो मुस्लिम समूह मिर्शिकार और नानबाई राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त होने के बावजूद केंद्रीय सूची में शामिल नहीं हैं।
इसके विपरीत, कुछ ऐसे समूह भी हैं जिन्हें केंद्र की सूची में जगह मिली है, परंतु संबंधित राज्य सूची में उनका समावेश अभी लंबित है। बिहार में कलवार और उत्तर प्रदेश में आतिशबाज इसके उदाहरण हैं।
विडंबना यह है कि अभी भी कुछ समूह ऐसे हैं जिन्हें न तो राज्य सूची में और न ही केंद्रीय सूची में स्थान मिल पाया है, जबकि उनका सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन स्पष्ट है।
यह दोहरी और असंगत व्यवस्था सामाजिक न्याय की मूल भावना को कमजोर करती है। एक ही जाति यदि राज्य स्तर पर पिछड़ी मानी जाती है, तो केंद्रीय स्तर पर उसकी उपेक्षा का कोई तार्किक औचित्य नहीं बनता। अतः आवश्यक है कि राज्य और केंद्र की सूचियों का तुलनात्मक पुनर्मूल्यांकन किया जाए, डेटा-आधारित मानकों के आधार पर विसंगतियों को दूर किया जाए, और एक समन्वित राष्ट्रीय नीति तैयार की जाए। यह सुधार केवल पसमांदा समाज के लिए नहीं, बल्कि समस्त ओबीसी समुदायों के लिए आवश्यक है।
कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में ओबीसी सूची में मुस्लिम समुदाय के अशराफ वर्ग भी शामिल हैं। इसलिए यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अपेक्षाकृत सशक्त और सामाजिक रूप से उन्नत अशराफ वर्ग ओबीसी श्रेणी के बाहर रहें। यदि आरक्षण का उद्देश्य सबसे पीछे छूटे वर्गों को आगे लाना है, तो समय-समय पर समीक्षा कर यह देखना आवश्यक है कि कौन समूह अब भी वास्तविक पिछड़ेपन की श्रेणी में आते हैं और किन्हें पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है।
रोहिणी आयोग ने पाया कि ओबीसी आरक्षण का लाभ कुछ प्रभावशाली जातियों तक सीमित हो गया है। इसलिए उप-वर्गीकरण वास्तविक प्रतिनिधित्व, शैक्षिक भागीदारी, सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण, तुलनात्मक वंचना, राज्य और केंद्र सूची की संगति तथा समय-समय पर श्रेणी की समीक्षा के आधारों पर होना चाहिए। यदि इन मानकों पर कुछ समूह अत्यंत कम प्रतिनिधित्व में पाए जाते हैं, तो उन्हें “अति-पिछड़ा” उप-वर्ग में रखा जाना चाहिए जो उनके धार्मिक नामकरण के बजाय वस्तुनिष्ठ मानकों के आधार पर हो।
ओबीसी आरक्षण का उद्देश्य धर्म-आधारित विभाजन नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक-शैक्षिक पिछड़ेपन का निवारण है। मुस्लिम ओबीसी और दलितों की चुनौतियाँ वास्तविक हैं, परंतु उनका समाधान धार्मिक उप-कोटा नहीं, बल्कि डेटा-आधारित, पारदर्शी और न्यायपूर्ण उप-वर्गीकरण है।
आवश्यक है कि ओबीसी श्रेणी का नियमित राष्ट्रीय सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण हो, राज्य और केंद्र सूचियों में समन्वय स्थापित किया जाए, उप-वर्गीकरण वस्तुनिष्ठ मानकों पर आधारित हो, और समयबद्ध समीक्षा की संवैधानिक व्यवस्था बने।
धर्म नहीं, बल्कि प्रमाणित सामाजिक-शैक्षिक पिछड़ापन और संरचनात्मक वंचना ही नीति का आधार बने। यही संविधानसम्मत, समावेशी और दीर्घकालिक सामाजिक न्याय का मार्ग है।
अनुवादक, स्तंभकार , मीडिया पैनलिस्ट
और पसमांदा सामाजिक कार्यकर्ता हैं


